Pages

Tuesday, 30 October 2012

एक तितली ! ... Entry by Vinay Gatagat, XIME Bangalore


एक तितली  की जैसी थी वह …

नाज़ुक  से  पंख उसके ,
नटखट से पैरों वाली ….

अपने  घोंसले मैं  खुश  रहती  थी  वह ,
जामने  से  न उसका  कोई  वास्ता  न  कोई  ख्वाइश …

मासूम  सी  नज़रों  से  करती  थी  वह ,
उनके  आने  का  इंतज़ार …

वक़्त  जैसे  थमा  सा था  उसकी  नज़रों  मैं,
और  आहटों  का  न  कोई  हिसाब  किताब …

एक तितली  की जैसी थी वह …

अपनी  ख्वाहिशों  को  पूरा  करने ,
खुला  छोड़ दिया  हैं  अब  उसको …

एक  डोर  के  सहारे  ज़िन्दगी  से  मुकाबला  करने ,
अपनी  मंजिल  की  तलाश और  सपनो  को  हकीक़त  मैं  बदलने …

पर  मंजिल  का न कोई नाम हैं न पता,
और  न  कोई  ख़त  मिला  हैं  जिसके  बह्रोंसे वह रास्ते  मिल  जाते …

बस अपनी  ही  धुंद  मैं,
सारी दुनिया पे अपनी चाप छोड़ने,
निकल  पड़ी  हैं  वह !!

अभी भी, एक तितली  की जैसी हैं वह …

No comments:

Post a Comment