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Wednesday, 31 October 2012

जीवन का रंग मंच ... Entry by Shalini Tiwari, NITIE Mumbai


इश्वर से विद्रोह मचाकर धरती पर मैं जनम ले आया
लेखा जोखा लिए हाथ पर ,इश्वर की यह कैसी माया
नन्ही आंखें खोल मैं देखूं, पलकों को झपका के देखू
माँ की सुन्दर मय्गर काया देख देख हर बार ये सोचु
इस से वंचित रख कर मुझको क्या विचित्र था खेल रचाया
इश्वर से विद्रोह मचाकर धरती पर मैं जनम ले आया
गिरकर उठान उठ कर चलना जीवन का दिन चर्या था
कथा कहानी सुनकर सोना जीवन का दिन चर्या था
बाबा के कंधे बैठ के राजा
घोडा उन्हें बुलाता था
घर में छुप कर दूर दौड़कर माँ को रोज़ सताता था
जीवन के इस रंग मंच पर बचपन का रस मुझको भाया
इस से वंचित रख कर मुझको क्या विचित्र था खेल रचाया
जीवन का पहिया ऐसा घूमा ,उम्र हो गयी तेरह की
गुड्डे गुडिया त्याग के मैंने कलम सियाही पुस्तक ली
दिन रात टूटकर महनत करते माँ बाबा को देख मैं रोया
उसी क्षण मैंने पढ़ लिख कर अफसर बन ने का स्वप्न संजोया
अगले दिन की भीषण बारिश में मैंने घर की छत को खोया
टूटे मकान की बिखरी ईंटो पे उस रात सर रख कर सोया
शिक्षा से नाता तोड़ के मैंने झूटे बर्तन मांजे थे
इसी तरह माँ बाबा और मैं दो वक़्त की रोटी पाते थे
जीवन के इस रंग मंच का ये पड़ाव अनजाना था
परिचय ना हो दुःख से मेरा इस लिए खेल ये रचाया था
इश्वर से विद्रोह मचाकर.........

 
(An unborn child argues with God who doesn’t allow him to take birth. After a lot of contemplations the child is allowed to take birth .It is then that he finds the reason that God was trying to protect him from the miseries that he might have to face on earth)

4 comments:

  1. Thumbs up...Great deity may exalt you to rise up strongly like this on the platform of real life....Congrates...:-)

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  2. इश्वर से विद्रोह मचाकर धरती पर मैं जनम ले आया... bhot dino bad kuchh bhot achha padhne ko mila...the poem is already a winner in every aspect

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